वीर: वीरेण पूज्यते का अनुवाद/ virah viren pujyte ka anuvad

वीर: वीरेण पूज्यते up board क्लास 10 के अन्तर्गत हिंदी में आने वाले संस्कृत भाग से लिया गया है। इस पाठ में कुल चार पात्र हैं अलक्षेन्द्र (सिकंदर), पुरुराज, सेनापति, आम्भिक virah viren pujyate ka anuvad, vyakhya aur bhaawaarth

स्थानम्- अलक्षेन्द्रस्य सैन्य शिविरम्। अलक्षेन्द्रः आम्भीकः च आसीनौ वर्तेते। वन्दिनं पुरुराजम् अग्रेकृत्वा एकतः प्रविशति यवन-सेनापतिः ।)

स्थान- सिकंदर का सैन्य शिविर। सिकंदर और आम्भीक बैठे हैं। बंदी पुरुराज को आगे करके एक यवन सेनापति प्रवेश करता है।

सेनापति- विजयतां सम्राट् । 

सम्राट की जय हो।

पुरुराज- एष भारतवीरोऽपि यवनराजम् अभिवादयते। 

यह भारतवीर भी आपका अभिवादन करता है।

अलक्षेन्द्र- (साक्षेपम्) अहो ! बन्धनगतः अपि आत्मानं वीर इति मन्यसे पुरुराज ? 

क्रोध के साथ अरे पुरुराज बंधन में होने पर तुम अपने आप को वीर मानते हो ?

पुरुराज- यवनराज ! सिंहस्तु सिंह एव, वने वा भवतु पञ्जरे वा। 

हे यवनराज शेर शेर ही होता है वन में हो या पिंजरे में।

अलक्षेन्द्र- किन्तु पञ्जरस्थः सिंहः न किमपि पराक्रमते। 

किंतु पिंजरे में रहने वाला शेर कोई पराक्रम नहीं दिखा सकता है।

पुरुराज- पराक्रमते, यदि अवसरं लभते। अपि च यवनराज !

पराक्रम का अवसर मिलेगा तो वह अवश्य दिखाएगा

बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः। 
उभयत्र समो वीरः वीर भावो हि वीरता ।।

बंधन में हो या मृत्यु में, जय हो या पराजय हो। दोनों परिस्थितियों में वीर व्यक्ति समान रूप से वीरता के भाव प्रकट करते हैं।

अंभिराज- सम्राट् ! वाचाल एष हन्तव्यः। आदिशतु सम्राट् । 

हे सम्राट यह वाचाल मृत्यु के योग्य है। आज्ञा दीजिए सम्राट।

अलक्षेन्द्र- अथ मम मैत्रीसन्धे अस्वीकरणे तव किम् अभिमतम् आसीत् पुरुराज ! 

मेरे साथ मैत्री संधि को अस्वीकार करने का तुम्हारा क्या कारण है।

पुरुराज- स्वराज्यस्य रक्षा, राष्ट्रद्रोहाच्च मुक्तिः। 

अपने राज्य की रक्षा, राष्ट्रद्रोह की भावना से मुक्ति।

अलक्षेन्द्र- मैत्रीकरणेऽपि राष्ट्रद्रोहः ?

क्या मित्रता करना भी राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है।

पुरुराज- आम् राष्ट्रद्रोहः यवनराज ! एकम् इदं भारतं राष्ट्रम्, बहूनि चात्र राज्यान्, बहवश्च शासकाः। त्वं मैत्रीसन्धिना तान् विभज्य भारतं जेतुम् इच्छसि। आम्भीकः चास्य प्रत्यक्षं प्रमाणम्। 

हाँ राष्ट्रद्रोह है यवनराज यह भारत राज्य एक है और इसके बहुत से राज्य हैं, बहुत से शासक हैं। तुम मैत्री संधि भारत को जितने की इच्छा से कर रहे हो। आंभिक इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

अलक्षेन्द्र – भारतम् एकं राष्ट्रम् इति तव वचनं विरुद्धम्। इह तावत् राजानः जनाः च परस्परं द्रुह्यन्ति। 

भारत एक राष्ट्र है यह तुम्हारा वचन परस्पर विरोधी है। यहां के राजागण आपस में लड़ते हैं।

पुरुराज- तत् सर्वम् अस्माकम् आन्तरिकः विषयः। बाह्यशक्तेः तत्र हस्तक्षेपः असह्यः यवनराज ! पृथग्धर्माः, पृथग्भाषाभूषा अपि वयं सर्वे भारतीयाः। विशालम् अस्माकं राष्ट्रम्। तथाहि-

यह सब हमलोगों का आंतरिक विषय है। हे यवनराज बाह्य शक्ति का हस्तक्षेप असहनीय है। पृथक धर्म पृथक वेशभूषा होने पर भी हम सब भारतीय हैं। हमारा राष्ट्र विशाल है।

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। 
वर्षं तद् भारतं नाम भारती तत्र सन्ततिः ।।

जिसके उत्तर में समुद्र और दक्षिण में हिमालय है उसका नाम भारत और उसकी संतति भारती है।

अलक्षेन्द्र- अथ मे भारतविजयः दुष्करः ।

इस प्रकार तो मेरा भारत विजय बहुत ही कठिन है।

पुरुराज- न केवलं दुष्करः असम्भवोऽपि। 

न केवल दुष्कर है बल्कि असंभव भी है।

अलक्षेन्द्र- (सरोषम्) दुर्विनीत, किं न जानासि, इदानीं विश्वविजयिनः अलक्षेन्द्रस्य अग्रे वर्तसे? 

क्रोध के साथ, क्या नहीं जान रहे हो इस समय तुम विश्वविजेता सिकंदर के सामने खड़े हो।

पुरुराज- जानामि, किन्तु सत्यं तु सत्यम् एव यवनराज ! भारतीयाः वयं गीतायाः सन्देशं न विस्मरामः।

जानता हूं किंतु सत्य तो सत्य ही है यवनराज। भारतीय अपने गीता के संदेश को नहीं भूले हैं।

अलक्षेन्द्र- कस्तावत् गीतायाः सन्देशः ?

कौन से गीता का संदेश ?

पुरुराज- श्रूयताम्।

सुनों

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥

वीरतापूर्ण कार्य करते हुए यदि तुम मृत्यु को प्राप्त होते हो तो तुम्हे स्वर्ग मिलेगा।

अलक्षेन्द्र- (किमपि विचिन्त्य) अलं तव गीतया। पुरुराज ! त्वम् अस्माकं बन्दी वर्तसे। ब्रूहि कथं त्वयि वर्तितव्यम्।

कुछ सोचकर। तुम्हारे गीता के संदेश का मैं निषेध करता हूं। हे पुरुराज तुम हमारे बंदी हो। कहो तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाय।

पुरुराज- यथैकेन वीरेण वीरं प्रति।

जैसा एक वीर दूसरे वीर के साथ करता है।

अलक्षेन्द्र- (पुरोः वीरभावेन हर्षितः) साधु वीर! साधु ! नूनं वीर असि। धन्यः त्वं, धन्या ते मातृभूमिः। (सेनापतिम् उद्दिश्य) सेनापते !

पुरुराज के वीर भाव से प्रसन्न होते हुए, हे उत्तम वीर तुम निश्चय ही वीरता के गुणों से भरे हो । तुम धन्य हो और तुम्हारी मातृभूमि धन्य है। सेनापति को निर्देशित करते हुए

सेनापति- सम्राट् !

जी सम्राट

अलक्षेन्द्र- वीरस्य पुरुराजस्य बन्धनानि मोचय।

वीर पुरुराज को बंधन से मुक्त कर दो।

सेनापतिः : यत् सम्राट् आज्ञापयति।

जैसी सम्राट की आज्ञा

अलक्षेन्द्रःः (एकेन हस्तेन पुरोः द्वितीयेन च आम्भीकस्य हस्तं गृहीत्वा) वीर पुरुराज ! सखे आम्भीक ! इतः परं वयं सर्वे समानमित्राणि, इदानीं मैत्रीमहोत्सवं सम्पादयामः ।

(एक हाथ में पुरुराज और दूसरे हाथ में आंभिक के हाथ को लेकर) वीर पुरुराज और मित्र आंभिक हम सब समान रूप से मित्र हुए। इस प्रकार मैत्री महोत्सव का आयोजन किया जाय।

(सर्वे निर्गच्छन्ति)

सभी निकल जाते हैं।

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