स्वदेश प्रेम कविता का भावार्थ / व्याख्या swdesh prem up board class 10

स्वदेश प्रेम कविता up board क्लास 10 हिंदी के अंतर्गत सम्मिलित काव्य खण्ड से लिया गया है| swdesh prem kavita ki vyakhya aur swdesh prem kavita ki vyakhya ko padhenge

अतुलनीय जिनके प्रताप का, साक्षी है प्रत्यक्ष दिवाकर।
घूम-घूम कर देख चुका है, जिनकी निर्मल कीर्ति निशाकर।।
देख चुके हैं जिनका वैभव, ये नभ के अनन्त तारागण।
अगणित बार सुन चुका है नभ, जिनका विजय-घोष रण-गर्जन ।१।

भावार्थ– सूर्य भारतीय वीरों के अतुलनीय प्रताप और पराक्रम का प्रत्यक्षदर्शी है। इनके निर्मल यश को चंद्रमा घूम-घूमकर सर्वत्र देख चुका है। आकाशमंडल में रहने वाले असंख्य तारा समूह भारतीय वीरों के वैभव को देख चुके हैं। आकाश असंख्य बार इनके रण-गर्जन विजयगान को सुन चुका है।

शोभित है सर्वोच्च मुकुट से, जिनके दिव्य देश का मस्तक, 
जिनके जय-गीतों से अब तक ।। गूँज रही हैं सकल दिशाएँ,
जिनकी महिमा का है अविरल, साक्षी सत्य-रूप हिम-गिरि-वर।
उतरा करते थे विमान-दल जिसके विस्तृत वक्षःस्थल पर ।२।

भावार्थ– भारतीय वीरों के सर्वोच्च त्याग और बलिदान से दिव्य देश का मस्तक महान पराक्रमरूपी मुकुट से सुशोभित हो रहा है। इनके विजय गीतों की ध्वनि से संपूर्ण दिशायें अब भी गूंज रही हैं। बर्फ से घिरे हुए श्रेष्ठ पर्वत निरंतर प्रवाहित होने वाली महिमा के सत्य-रूप का साक्षी हैं। भारतीय वीरों का वक्षस्थल इतना विस्तृत है कि उस पर बड़े से बड़े विमान दल उतरते रहते हैं। 

सागर निज छाती पर जिनके, अगणित अर्णव-पोत उठाकर ।
पहुँचाया करता था प्रमुदित, भूमंडल के सकल तटों पर।।
नदियाँ जिसकी यश-धारा-सी बहती हैं अब भी निशि-वासर।
ढूँढ़ो उनके चरण-चिह्न भी, पाओगे तुम इनके तट पर ।३।

भावार्थ– समुद्र अपने जलरूपी छाती पर असंख्य समुद्री जलयान को उठाकर आनंदित मन से संसार के सभी तटों पर पहुंचाया करता है| उन देश भक्तों के पराक्रम और यश की धारा को नदियां अब भी निरंतर दिन रात प्रवाहित कर रही हैं| उन वीरों को अगर तुम खोजोगे तो नदियों के किनारे उनके चरण चिह्न अवश्य मिल जाएंगे| 

विषुवत् रेखा का वासी जो, जीता है नित हाँफ-हाँफ कर।
रखता है अनुराग अलौकिक, यह भी अपनी मातृभूमि पर।।
ध्रुव-वासी, जो हिम में तम में, जी लेता है काँप-काँप कर।
वह भी अपनी मातृभूमि पर, कर देता है प्राण निछावर ।४।

भावार्थ– विषम परिस्थितियों में जीवन यापन करने वाला व्यक्ति भी अपनी मातृभूमि से अनंत और असीम प्रेम करता है| ध्रुव पर रहने वाला व्यक्ति अंधकार और भयंकर बर्फ में जीता है उसके बाद भी जरूरत पड़ने पर मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों को हँसते-हँसते न्योछावर कर देता है|

तुम तो, हे प्रिय बंधु, स्वर्ग-सी, सुखद, सकल विभवों की आकर।
धरा-शिरोमणि मातृ-भूमि में, धन्य हुए हो जीवन पाकर।।
तुम जिसका जल अन्न ग्रहण कर, बड़े हुए लेकर जिसकी रज।
तन रहते कैसे तज दोगे, उसको, हे वीरों के वंशज ।५।

भावार्थ– हे देशभक्तों तुम परम प्रिय और बंधु जैसे हो| स्वर्ग के समान सुखों को देने वाले और सम्पूर्ण ऐश्वर्य की खान हो| धरा शिरोमणि रूपी मातृभूमि में जन्म लेकर तुम धन्य हो| तुमने जहां का अन्न जल ग्रहण किया है और जिसकी मिट्टी में तुम बड़े हुए हो, हे वीर पुत्र शरीर में प्राण रहते तुम उसका परित्याग कैसे कर दोगे| अर्थात् कभी नहीं कर पाओगे|

जब तक साथ एक भी दम हो, हो अवशिष्ट एक भी धड़कन।
रखो आत्म-गौरव से ऊँची, पलकें ऊँचा सिर, ऊँचा मन।।
एक बूँद भी रक्त शेष हो, जब तक मन में हे शत्रुंजय !
दीन वचन मुख से न उचारो, मानो नहीं मृत्यु का भी भय ।६।

भावार्थ– कवि देशभक्तों को संबोधित करते हुए उनके जोश को बढ़ाते हुए कहता है कि जबतक तुम्हारे शरीर में  एक भी सांस और धड़कन बची हो तबतक अपने आत्मगौरव से अपने सिर और अपने मन को ऊंचा किए रहो| शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले हे शत्रुंजय जबतक तुम्हारे शरीर में रक्त का एक भी बूंद बचा हो तबतक अपने मुख से दीनता के शब्द का उच्चारण मत करो| 

निर्भय स्वागत करो मृत्यु का, मृत्यु एक है विश्राम-स्थल ।
जीव जहाँ से फिर चलता है, धारण कर नव जीवन-संबल ।।
मृत्यु एक सरिता है, जिसमें, श्रम से कातर जीव नहाकर।
फिर नूतन धारण करता है, काया-रूपी वस्त्र बहाकर ।७।

भावार्थ– कवि मृत्यु को विश्रामस्थल बताते हुए कहता है कि ही देशभक्तों निर्भय होकर तुम इसका स्वागत करो क्योंकि व्यक्ति यहां से नवीन जीवन धारण करके आगे की तरफ चलता है| मृत्यु एक नदी के समान है जिसमें जीवात्मा स्नान करने के बाद शरीररूपी वस्त्र को फेंककर नए शरीर को धारण करता है| 

सच्चा प्रेम वही है जिसकी तृप्ति आत्म-बलि पर हो निर्भर।
त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है, करो प्रेम पर प्राण निछावर ।।
देश-प्रेम वह पुण्य-क्षेत्र है, अमल असीम त्याग से विलसित।
आत्मा के विकास से जिसमें, मनुष्यता होती है विकसित ।८।

भावार्थ– कवि सच्चे प्रेम के महत्त्व को बताते हुए कहता है कि वास्तविक प्रेम वही है जिसका निर्माण आत्मबलिदान की भावना से हुआ हो| अंत में कवि बताता है कि देशप्रेम वह पवित्र क्षेत्र है जो विकाररहित और त्याग की भावना सिक्त है| यदि आत्मा का विस्तार होता है तो मनुष्यता की भावना का विकास उतना ही ज्यादा होता है| 

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