Up board class 12 ke chapter 1 se प्रेम माधुरी की व्याख्या व भावार्थ का अध्ययन करेंगे explain Prem madhuri kavita
मारग प्रेम को को समुझे ‘हरिचन्द’ यथारथ होत यथा है।
लाभ कछु न पुकारन में बदनाम ही होन की सारी कथा है।
जानत है जिय मेरौ भली बिधि औरु उपाइ सबै बिरथा है।
बावरे हैं ब्रज के सिगरे मोहिं नाहक पूछत कौन बिथा है।। 1 ।।
भावार्थ– हरिश्चंद्र जी कहते हैं कृष्ण के वियोग में व्याकुल गोपिकाएं अपनी मनोदशा व्यक्त करते हुए कहती है कि वास्तविक प्रेम के मार्ग को कौन समझ सकता है। अपने प्रेम को लोगों के सामने प्रकाश में लाने पर कोई लाभ नहीं है बल्कि इससे बदनामी ही मिलेगी। मेरा मन भलीभांति यह बात जानता है कि कृष्ण की प्राप्ति का जितना मार्ग मेरे द्वारा बनाया जाएगा वह सब व्यर्थ सिद्ध होगा। ब्रज के सभी लोग बावले है जो व्यर्थ में ही मुझसे पूछते हैं कि तुम्हें कौन सा कष्ट है जो तुम इतनी व्याकुल हो।
रोकहिं जो तौ अमंगल होय औ प्रेम नसै जो कहैं पिय जाइए।
जौ कहें जाहु न तौ प्रभुता जौ कछू न कहें तो सनेह नसाइए।
जो ‘हरिचन्द’ कहैं तुमरे बिनु जीहैं न तो यह क्यों पतिआइए।
तासों पयान समै तुमरे हम का कहें आपै हमें समझाइए।।2।1
भावार्थ– गोपिकाएं कहती है कि यदि मैं कृष्ण को जाने से रोकती हूं तो अमंगल होगा, यदि उनको जाने के लिए कहती हूं तो प्रेम का नाश हो जाएगा। यदि कहती हूं की तुम मत जाओ तो यह आदेशात्मक होगा। यदि कुछ नहीं कहती हूं तो प्रेम का अपमान होगा। यदि मैं यह कहती हूं कि हे कृष्ण तुम्हारे बिना मैं जीवित नहीं रहूँगी तो इस बात पर कौन विश्वास करेगा। तुम्हारे प्रस्थान के समय हम तुमसे क्या कहें मुझे समझाकर बताओ।
आजु लौं जौ न मिले तौ कहा हम तो तुमरे सब भाँति कहावें।
मेरौ उराहनो है कछु नाहिं सबै फल आपने भाग को पावें।
जो ‘हरिचंद’ भई सो भई अब प्रान चले चहैं तासों सुनावैं।
प्यारे जू है जग की यह रीति बिदा की समै सब कंठ लगावें।।3।।
भावार्थ– गोपिकाएं कृष्ण के वियोग में अपनी मनोदशा व्यक्त करते हुए कहती हैं कि आजतक कृष्ण हमें नहीं मिले उसके बाद हम गोपिकाएं सब प्रकार से उन्हीं का कहलाती हैं। किसी से मेरी कोई शिकायत नहीं है क्योंकि सभी लोग अपने-अपने भाग्य के अनुसार फल पाते हैं। आगे गोपिकाएं कहती हैं कि कृष्ण वियोग में मेरे प्राण अब निकलने वाले हैं जिसको जो सुनाना हो सुना दे। हे प्यारे कृष्ण संसार की यह रीति है कि व्यक्ति का अंत समय जानकर लोग उसे गले लगाते हैं या उसके प्रति अपने प्रेम भाव को प्रकट करते हैं
व्यापक ब्रह्म सबै थल पूरन हैं हमहूँ पहचानती हैं।
पै बिना नंदलाल बिहाल सदा ‘हरिचन्द’ न ज्ञानहिं ठानती हैं।
तुम ऊधौ यह कहियो उनसों हम और कछु नहिं जानती हैं।
पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अखियाँ दुखियाँ नहिं मानती हैं।।4।1
भावार्थ– गोपिकाएं कहती हैं कि ब्रह्म का स्वरूप व्यापक है और वह सर्वत्र विद्यमान है, इतना हमे भी पहचान है लेकिन कृष्ण के बिना हम किसी अन्य ज्ञान को नहीं जानती हैं। हे उद्धव तुम जाकर कृष्ण से इतना कहना कि मेरी दुखियारी आँखें सदैव उन्हीं को खोजती हैं और उन्हीं के साथ रहना पसंद करती हैं।